सवाई माधोपुर, 17 अप्रैल।  राजस्थान के सवाई माधोपुर से समाज की बंदिशों को पीछे छोड़ती एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने न सिर्फ परंपराओं को नई परिभाषा दी, बल्कि पिता-पुत्री के अटूट प्रेम की एक मिसाल भी पेश की। जिला मुख्यालय की बाल मंदिर कॉलोनी में रहने वाले ठाकुर मोहन सिंह राजावत की अंतिम विदाई ने पूरे शहर को भावुक कर दिया।

ब्रेन कैंसर से जंग और वो आखिरी ख्वाहिश

ठाकुर मोहन सिंह राजावत लंबे समय से ब्रेन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, बीमारी के दौरान और अपने अंतिम दिनों में वे अक्सर एक ही बात दोहराते थे, मेरी बेटी किसी बेटे से कम नहीं है, मेरी आखिरी विदाई भी वही करेगी। यह उनके लिए सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि अपनी बेटी बृजेश कंवर पर अटूट भरोसा था।

जब बेटी ने संभाला अर्थी का कंधा

गुरुवार को जब मोहन सिंह राजावत की अंतिम यात्रा शुरू हुई तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें ठहर गईं। पिता के कहे शब्दों को मान देते हुए बेटी बृजेश कंवर आगे आईं, उन्होंने न केवल अपने पिता को पुष्पांजलि अर्पित की बल्कि स्वयं अर्थी को कंधा देकर श्मशान घाट तक पहुंचाया। आंखों में पिता को खोने का गम था लेकिन पिता के संकल्प को पूरा करने की हिम्मत उससे कहीं ज्यादा बड़ी थी।

जब बेटी ने दी मुखाग्नि

श्मशान घाट पर वह पल सबसे भावुक कर देने वाला था जब अंतिम संस्कार की रस्म अदायगी शुरू हुई, सदियों पुरानी चली आ रही परंपराओं को दरकिनार करते हुए बृजेश कंवर ने पूरे विधि-विधान के साथ अपने पिता को मुखाग्नि दी। इस साहसी फैसले में बृजेश अकेली नहीं थीं उनके इस कदम के पीछे उनके परिवार की सकारात्मक सोच खड़ी थी, बृजेश ने इस अंतिम विदाई के लिए अपने ससुर और पति से अनुमति मांगी थी ससुराल पक्ष ने न केवल उन्हें अनुमति दी, बल्कि इस पूरे सफर में उनके साथ खड़े रहकर यह साबित किया कि रिश्ते और इंसानियत रूढ़ियों से ऊपर हैं।

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